5 साल संविदा पर रखे जाने और 50 साल में रिटायर्ड -खाली अफवाह-डिप्टी सीएम मौर्य


देश में Covid-19 के सक्रिय मामलों की संख्या बढ़कर 10 लाख के पार पहुंच गई है, जबकि संक्रमितों का आंकड़ा 52 लाख के पार हो गया है। देश में इस समय कोरोना संक्रमितों की कुल संख्या 52,14,678 है, जबकि कोविड-19 के सक्रिय मामलों की संख्या 10,17,754 है। भारत इस महामारी से प्रभावित होने के मामले में विश्व में अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर है। अमेरिका में इस संक्रमण से अब तक 66 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं। देश में 24 घंटे दौरान रिकॉर्ड 87,472 लोग स्वस्थ हुए हैं और इसके बाद इस महामारी से निजात पाने वाले लोगों की संख्या 41,12,551 हो गई है। यह संख्या देश में कोरोना के सक्रिय मामलों से 4.04 गुना यानी 30,94,797 अधिक है। देश में सक्रिय मामले 19.52 प्रतिशत और रोग मुक्त होने वालों की दर 78.86 फीसदी है, जबकि मृत्यु दर 1.62 फीसदी है। देश में गत 11 दिन से हर रोज 70 हजार से अधिक लोग इस जानलेवा विषाणु को मात देने में कामयाब हुए हैं।


उत्तर प्रदेश में नौकरी में 5 साल की अनिवार्य संविदा लागू किए जाने की खबरें सामने आने के बाद योगी सरकार पर चौतरफे हमले हो रहे थे. सरकार एक ओर जहां बेरोजगार युवाओं का रोष झेल रही थी तो वहीं विपक्षी दल भी इस मुद्दे को लेकर सरकार पर हमले पर हमले किए जा रहे थे. इसी बीज यूपी के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने इस खबर को सिरे से ही खारिज कर दिया है. उनका कहना है कि ये खबर कोरी अफवाह है. यूपी में सरकारी नौकरियों में 5 साल संविदा पर रखे जाने और 50 साल में रिटायर्ड किये जाने के मामले को लेकर डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का बड़ा बयान सामने आया है. केशव मौर्य ने दोनों चर्चाओं को गलत बताया है. केशव मौर्य ने कहा, "विपक्षी फैला रहे है इस बारे में अफवाह, इन दोनों बातों में कोई सच्चाई नहीं है, सरकार ने ऐसा कोई फैसला नहीं लिया और न ही ऐसा करने का कोई इरादा है, सरकार ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार देने की तैयारी कर रही है." केशव मौर्या के कहा जो लोग कोहराम मचा रहे हैं वह खाली अफवाह फैला रहे हैं. प्रदेश की सरकार के माध्यम से संविदा की जो पूर्व व्यवस्था है उसमें ना कोई परिवर्तन हुआ है और ना अभी होने वाला है. ना अभी कोई सरकार के स्तर पर विचार है आगे भी नहीं होगा ना ऐसा विचार है. यह भी अफवाह फैलाने वाली बात है, ना कोई 50 वर्ष में रिटायर करने का काम है, ना कोई संविदा की व्यवस्था नए तरीके से लागू करने की योजना है.


कृषि विधेयकों का जोरदार विरोध कर रही कांग्रेस आज खुद बुरी तरह फंसती दिख रही है। पहले कांग्रेस के निलंबित नेता और पूर्व प्रवक्ता संजय झा ने पार्टी को याद दिलाया कि आज कांग्रेस जिस विधेयक का विरोध कर रही है, वे साल 2019 के लोकसभा चुनाव में उसके चुनावी घोषणा पत्र में शामिल था तो वहीं कांग्रेस का 6 साल पहले का एक वीडियो भी खूब वायरल हो रहा है। कृषि विधेयक का विरोध कर रही कांग्रेस  खुद इस वीडियो में फल और सब्जी को एपीएमसी से बाहर निकालने की बात कर रही है। इस वीडियो में कांग्रेस नेता अजय माकन खुद राहुल गांधी के सामने एपीएमसी एक्ट में संशोधन की बात करते दिखाई दे रहे हैं। यह वीडियो 27 दिसंबर 2013 का है, जो कांग्रेस के ऑफिशियल यूट्ब चैनल पर मौजूद है और उसे यहां पर आपके लिए अटैच किया गया है। इसमें माकन एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राहुल गांधी के सामने घोषणा कर रहे हैं. इसमें वह कह रहे हैं कि महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के लिए कांग्रेस के ग्यारह मुख्यमंत्रियों की बैठक में फैसला लिया गया कि किसानों को सहूलियत पहुंचाने और उपभोक्ताओं को कम कीमत में फल और सब्जियां उपलब्ध कराने के लिए इन्हें APMC ऐक्ट के तहत बनी लिस्ट से हटाया जाएगा। कृषि विधेयकों पर कांग्रेस के विरोध के बीच 2013 का कांग्रेस के ऑफिशल हैंडल से किया गया ट्वीट भी वायरल हो रहा है। इस ट्वीट में कांग्रेस ने लिखा है कि सभी कांग्रेस शासित राज्य APMC ऐक्ट से फल और सब्जियों को हटाएंगे।


कृषि बिल पर कांग्रेस के विरोछ के बीच बीजेपी ने 2013 के वीडियो को ट्वीट किया है जिसमें राहुल गांधी एपीएमसी ऐक्ट को हटाने के समर्थन में है। कृषि बिल पर क्या कांग्रेस का सुर होगा नरम, बीजेपी का तंज- राहुल जी प्लीज ट्वीट मत कीजिएगा डिलीट. संजय झा ने अपनी पार्टी पर साधा निशाना, कांग्रेस मैनिफेस्टो में एपीएमसी ऐक्ट हटाने का था वादा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बिहार को केंद्र की तरफ से कई सौगातें दी। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि लोकसभा में जो बिल पारित हुआ है उससे किसानों को बंधनों से मुक्ती मिलेगी। कृषि सुधारों से जुड़े विधेयकों पर विपक्ष और सरकार के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी है। विपक्ष ने इन विधेयकों को किसान विरोधी बताते हुए इनकी आलोचना की है। विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि जो लोग वर्षों तक सत्ता में रहे वे आज किसानों को गुमराह कर रहे हैं। पीएम ने किसानों को भरोसा दिया कि इन विधेयकों से उनकी आय में वृद्धि होगी और मंडियां पहले की तरह उनकी उत्पाद की खरीदारी करेंगी।


कृषि और किसानों से जुड़े दो बिलों को लेकर किसानों के विरोध की गूंज संसद से सड़क तक सुनाई दे रही है. दोनों बिल लोकसभा में गुरुवार को पास हो गए. आइए आसान भाषा में जानते हैं कि क्या है इन बिलों में और क्या बताए जा रहे हैं इनके लाभ? साथ ही इनको लेकर क्या आशंकाएं जताई जा रही हैं, उस पर भी एक नजर डालते हैं.


दो बिल कौन से


1- कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधा) विधेयक-2020


2- कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020


कृषि से जुड़े इन दो बिलों के अलावा आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020 के प्रावधानों को लेकर भी किसानों की ओर से ऐतराज जताया जा रहा है. इस बिल को पहले ही लोकसभा में पास कराया जा चुका है.जहां तक कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधा) विधेयक-2020 का सवाल है तो ये राज्य-सरकारों की ओर से संचालित एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (APMC) मंडियों के बाहर (“बाजारों या डीम्ड बाजारों के भौतिक परिसर के बाहर”) फार्म मंडियों के निर्माण के बारे में है. भारत में 2,500 एपीएमसी मंडियां हैं जो राज्य सरकारों द्वारा संचालित हैं. वहीं दूसरा बिल [कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020)] कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग या अनुबंध खेती के बारे में है.


राज्यों की कृषि उत्पादन विपरण समिति यानि एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (APMC) के अधिकार बरकरार रहेंगे. इसलिए किसानों के पास सरकारी एजेंसियों का विकल्प खुला रहेगा.  नए बिल किसानों को इंटरस्टेट ट्रेड (अंतरराज्यीय व्यापार) को प्रोत्साहित करते हैं, किसान अपने उत्पादों को दूसरे राज्य में स्वतंत्र रूप से बेच सकेंगे.   वर्तमान में APMCs की ओर से विभिन्न वस्तुओं पर 1% से 10 फीसदी तक बाजार शुल्क लगता है, लेकिन अब राज्य के बाजारों के बाहर व्यापार पर कोई राज्य या केंद्रीय कर नहीं लगाया जाएगा किसी APMC टैक्स (या कोई लेवी और शुल्क आदि) का भुगतान नहीं होगा. इसलिए और कोई दस्तावेज की जरूरत नहीं. खरीदार और विक्रेता दोनों को लाभ मिलेगा (निजी कंपनियों और व्यापारियों की ओर से APMC टैक्स का भुगतान होगा, किसानों की ओर से नहीं). किसान कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग या अनुबंध खेती के लिए प्राइवेट प्लेयर्स या एजेंसियों के साथ भी साझेदारी कर सकते हैं.  कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग निजी एजेंसियों को उत्पाद खरीदने की अनुमति देगी - कॉन्ट्रेक्ट केवल उत्पाद के लिए होगा. निजी एजेंसियों को किसानों की भूमि के साथ कुछ भी करने की अनुमति नहीं होगी और न ही कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग अध्यादेश के तहत किसान की जमीन पर किसी भी प्रकार का निर्माण होगा. वर्तमान में किसान सरकार की ओर से निर्धारित दरों पर निर्भर हैं. लेकिन नए आदेश में किसान बड़े व्यापारियों और निर्यातकों के साथ जुड़ पाएंगे, जो खेती को लाभदायक बनाएंगे. प्रत्येक राज्य में कृषि और खरीद के लिए अलग-अलग कानून हैं. एक समान केंद्रीय कानून सभी हितधारकों (स्टेकहोल्डर्स) के लिए समानता का अवसर उपलब्ध कराएगा.  नए बिल कृषि क्षेत्र में अधिक निवेश को प्रोत्साहित करेंगे क्योंकि इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी. निजी निवेश खेती के बुनियादी ढांचे को और मजबूत करेगा और रोजगार के अवसर पैदा करेगा.  APMC प्रणाली के तहत केवल लाइसेंस प्राप्त व्यापारी जिसे आड़तिया (बिचौलिया) कहा जाता है, को अनाज मंडियों में व्यापार करने की अनुमति थी, लेकिन नया विधेयक किसी को भी पैन नंबर के साथ व्यापार करने की अनुमति देता है. इससे बिचौलियों का कार्टेल टूट जाएगा – जो पूरे भारत में एक अहम मुद्दा है.  नया बिल बाजार की अनिश्चतिता के जोखिम को किसान से निजी एजेंसी और कंपनी की ओर ट्रांसफर करेगा.


2015 में आई शांता कुमार समिति की रिपोर्ट के मुताबिक 94% किसान पहले से ही निजी कंपनियों और व्यापारियों को अपने उत्पाद बेच रहे हैं. APMC मंडियों में केवल 6% किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में सरकारी खरीद एजेंसियों को अपने उत्पाद बेचते हैं, लेकिन उन पर (6% किसानों) निजी कंपनियों और व्यापारियों को उत्पाद बेचने के लिए कोई प्रतिबंध नहीं है. भारत की सरकारी खरीद में पंजाब और हरियाणा का हिस्सा लगभग 90% है. शेष खरीद ज्यादातर मध्य प्रदेश, राजस्थान और कुछ अन्य राज्यों से होती है. इसलिए अधिकतर राज्य पहले से ही खरीद योजनाओं से बाहर हैं. पंजाब और हरियाणा में - वर्तमान समय में फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया जैसी एजेंसियां किसानों का 100 फीसदी गेहूं और चावल आदि खरीद कर उसपर एमएसपी की सहूलियत देती है, लेकिन किसान संगठनों और विपक्षी पार्टियों को शक है कि निजी मंडिया खुल जाने से सरकारी एजेंसियों की प्रोक्योरमेंट काफी घट जाएगा. बाकी उपज कौन खरीदेगा- इसका जवाब निजी एजेंसियां हैं, जो किसानों की निजी खरीद पर निर्भरता बढ़ाएगा. चावल पंजाब और हरियाणा में केवल खरीद के लिए पैदा किया जाता है क्योंकि यहां स्थानीय खपत बहुत कम है. भविष्य में चावल की पूरी उपज निजी खरीद पर निर्भर हो सकती है.  किसान और किसान यूनियनों को डर है कि कॉरपोरेट्स कृषि क्षेत्र से लाभ प्राप्त करने की कोशिश करेंगे.  किसान इसलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि बाजार कीमतें आमतौर पर MSP कीमतों से ऊपर या समान नहीं होतीं. (हर साल 23 फसलों के लिए MSP घोषित होता है)   केंद्र ने MSP प्रणाली को जारी रखने का बेशक आश्वासन दिया होगा, लेकिन भविष्य में इसके चरणबद्ध ढंग से समाप्त होने की संभावना है. विधेयकों से खाद्य पदार्थों के संग्रहण पर मौजूदा प्रतिबंधों को हटाने का इरादा दिखता है. ऐसी आशंकाएं हैं कि बड़े प्लेयर्स और बड़े किसान जमाखोरी का सहारा लेंगे जिससे छोटे किसानों को नुकसान होगा, जैसे कि प्याज की कीमतों में. APMC के स्वामित्व वाले अनाज बाजार (मंडियों) को उन बिलों में शामिल नहीं किया गया है जो इन पारंपरिक बाजारों को एक वैकल्पिक विकल्प के रूप में कमजोर करेगा.   राज्य राजस्व को खो देंगे जो बाजार शुल्क के रूप में एकत्र किया गया है.


     आमतौर पर किसान अपने स्थानीय अनाज बाजार में जाते हैं और अपनी उपज को बिचौलिए को बेचते हैं जिसे आढ़ती कहा जाता है. किसानों को राज्य के बाहर अपनी उपज बेचने की अनुमति नहीं है और यदि वे ऐसा करते हैं तो उन्हें संबंधित राज्य एपीएमसी को बाजार शुल्क का भुगतान करना होगा - जो कि 6% तक है. भारतीय खाद्य निगम (FCI) जैसी कुछ राज्य और केंद्रीय एजेंसियां जन वितरण प्रणाली (PDS) आदि के लिए तय MSP पर इन बिचौलियों के माध्यम से खाद्यान्न की खरीद करती हैं. भले ही बाजार में कीमतें अधिक हों, किसानों को लाभ नहीं मिलता है या उनकी कोई भूमिका नहीं होती है. ये बिचौलिए खाद्यान्न के अलावा कृषि उपज भी खरीदते हैं और इसे थोक विक्रेताओं को ऊंचे दामों पर बेचकर मोटा मुनाफा कमाते हैं. ये बिचौलिए अक्सर जरूरतमंद किसानों को ऊंची ब्याज दर पर कर्ज देकर मनी लैंडिंग रैकेट भी चलाना शुरू कर देते हैं. किसान अपनी जमीन गिरवी रखकर इन निजी साहूकारों (ब्याज पर कर्ज देने वाले) से कर्ज लेते हैं. पंजाब में जितने किसानों ने खुदकुशी की, उनमें से अधिकतर के लिए जिम्मेदार इन बिचौलियों की ओर से चलाया जा रहा कर्ज देने वाले रैकेट ही है.



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