आर्मीनिया-अज़रबैजान के बीच छिड़ी लड़ाई


नागोर्नो-काराबाख़ दशकों से पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रह चुके आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच तनाव का कारण बना हुआ है. दक्षिण पूर्वी यूरोप में पड़ने वाले कॉकेशस के इस पहाड़ी इलाक़े को अज़रबैजान अपना कहता है. हालाँकि 1994 के बाद से इस पर आर्मीनिया का कब्ज़ा है. आर्मीनिया-अज़रबैजान के बीच छिड़ी लड़ाई, तुर्की-रूस-ईरान भी सक्रिय, दशकों पुराना है नागोर्नो-काराबाख का विवाद. 80 के दशक के अंत से 90 के दशक के मध्य तक यहां दोनों देशों में युद्ध हुआ था. इस दौरान 30 हज़ार से अधिक लोगों की मौत हुई थी और 10 लाख से अधिक विस्थापित हुए थे. उस दौरान अलगावादी ताक़तों ने नागोर्नो-काराबाख के कुछ इलाक़ों पर कब्ज़ा जमा लिया था. इस समय आर्मीनिया और अज़रबैजान ने युद्धविराम की घोषणा भी की थी लेकिन 1994 में हुए युद्धविराम के बाद भी यहाँ गतिरोध जारी है. भौगोलिक और रणनीतिक तौर पर अहम होने के कारण भी ये विवाद जटिल हो गया है. सदियों से इलाक़े की मुसलमान और ईसाई ताकतें इन पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहती रही हैं. इस इलाक़े से गैस और कच्चे तेल की पाइपलाइनें गुज़रती है इस कारण इस इलाक़े के स्थायित्व को लेकर चिंता जताई जा रही है.


  1920 के दशक में जब सोवियत संघ बना तो अभी के ये दोनों देश (आर्मीनिया और अज़रबैज़ान) उसका हिस्सा बन गए. लेकिन असल विवाद 1980 के दशक में शुरू हुआ जब सोवियत संघ का विघटन शुरू हुआ और नागोर्नो-काराबाख को सोवियत अधिकारियों ने अज़रबैजान के हाथों सौंप दिया. नागोर्नो-काराबाख की संसद ने आधिकारिक तौर पर ख़ुद को आर्मीनिया का हिस्सा बनाने के लिए वोट किया. नागोर्नो-काराबाख की अधिकतर आबादी आर्मीनियाई है. दशकों तक नागोर्नो-काराबाख के लोग ये इलाक़ा आर्मीनिया को सौंपने की अपील करते रहे.इस मुद्दे को लेकर यहां अलगाववादी आंदोलन शुरू हो गया और अज़रबैजान ने इसे ख़त्म करने की कोशिश की. इस आंदोलन को लगातार आर्मीनिया का समर्थन मिलता रहा. नतीजा ये हुआ कि यहां जातीय संघर्ष होने लगे और सोवियत संघ से पूरी तरह आज़ाद होने के बाद एक तरह का युद्ध शुरू हो गया. यहां हुए संघर्ष के कारण लाखों लोगों को अपना घर छोड़ कर पलायन करना पड़ा. दोनों पक्षों की तरफ़ से जातीय नरसंहार की ख़बरें भी आईं. साल 1994 में रूस की मध्यस्थता में युद्धविराम की घोषणा से पहले नागोर्नो-काराबाख पर आर्मीनियाई सेना का क़ब्ज़ा हो गया.इस डील के बाद नागोर्नो-काराबाख अज़रबैजान का हिस्सा तो रहा लेकिन इस इलाक़े पर अलगाववादियों की हूकूमत रही जिन्होंने इसे गणतंत्र घोषित कर दिया. यहां आर्मीनिया के समर्थन वाली सरकार चलने लगी जिसमें आर्मीनियाई जातीय समूह से जुड़े लोग थे.इस डील के तहत नागोर्नो-काराबाख लाइन ऑफ़ कॉन्टैक्ट भी बना, जो आर्मीनिया और अज़रबैजान के सैनिकों को अलग करता है.नागोर्नो-कराबाख़ में शांति बनाए रखने के लिए 1929 में फ्रांस, रूस और अमरीका की अध्यक्षता में ऑर्गेनाइज़ेशन फ़ॉर सिक्योरिटी एंड कोऑपरेशन इन यूरोप मिंस्क ग्रुप की मध्यस्थता में शांति वार्ता शुरू हुई थी.हाल में मिंस्क ग्रुप की एक बैठक के बाद अमरीका, फ्रांस और रूस ने नागोर्नो काराबाख़ में जारी लड़ाई की आलोचना की है और कहा है कि 'युद्ध जल्द ख़त्म होना चाहिए'.हालाँकि अज़रबैजान के समर्थन में उतरे तुर्की ने युद्धविराम की मांग को रद्द कर दिया है. तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन ने कहा है कि युद्धविराम तभी संभव है जब आर्मीनिया अज़रबैजान के इलाक़े पर अपना कब्ज़ा ख़त्म करे.वहीं रूस के आर्मीनिया के साथ गहरे संबंध हैं और मौजूदा तनाव के बीच उसने दोनों देशों के बीच मध्यस्थता की पेशकश की है.यहां रूस का एक सैन्य ठिकाना भी है और दोनों देश सैन्य गुट कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन के सदस्य हैं. लेकिन अज़रबैजान की सरकार के साथ भी रूस के अच्छे संबंध हैं.अज़रबैजान में बड़ी संख्या में तुर्क मूल के लोग रहते हैं. ऐसे में नेटो के सदस्य देश तुर्की ने साल 1991 में एक स्वतंत्र देश के रूप में अज़रबैजान के अस्तित्व को स्वीकार किया. अज़रबैजान के पूर्व राष्ट्रपति ने तो दोनों देशों के रिश्तों को 'दो देश एक राष्ट्र' तक कहा था.वहीं, आर्मीनिया के साथ तुर्की के कोई आधिकारिक संबंध नहीं हैं. 1993 में जब आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच सीमा विवाद बढ़ा तो अज़रबैजान का समर्थन करते हुए तुर्की ने आर्मीनिया के साथ सटी अपनी सीमा बंद कर दी.लेकिन इस पर तुर्की से फ्रांस नाराज़ हो गया है. फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने तुर्की से कहा है कि अब इस मामले में ख़तरे की रेखा पार कर ली गई है, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता.


आर्मीनिया-अज़रबैजान की लड़ाई में सीरियाई युवा.आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पशिनयान ने ये दावा दोहराया है कि इस विवाद में मर्सिनरी (किराए के लड़ाके) जुड़ गए हैं जो अज़रबैजान और तुर्की 'विदेशी आतंकी लड़ाकों की मदद और हिस्सेदारी से' ये जंग लड़ रहे हैं. उनकी इस बात से फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों भी इत्तफ़ाक रखते हैं, जिन्होंने कहा था कि इस बात की ख़ुफ़िया जानकारी मिली है कि 'जिहादी समूहों' के 300 सीरियाई लड़ाके एलप्पो से निकाले गए हैं और वो अज़रबैजान के लिए तुर्की के रास्ते जा रहे हैं.आर्मीनिया ने इससे पहले भी आरोप लगाया था कि सीरिया के क़रीब 4,000 नागरिकों को लड़ाई में शिरकत करने के लिए अज़रबैजान भेजा गया है लेकिन तुर्की ने इस बात से इनकार किया है.अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव का कहना है कि आर्मीनिया के साथ जारी इस लड़ाई में तुर्की बाहर से समर्थन कर रहा है लेकिन वो इसमें सीधे तौर पर शामिल नहीं है.अज़रबैजान में बड़ी संख्या में तुर्क मूल के लोग रहते हैं. ऐसे में राजनीतिक और सांस्कृतिक तौर पर तुर्की और अज़रबैजान बेहद क़रीब हैं. लेकिन ये पहली बार नहीं है जब सीरियाई लड़ाकों को लड़ाई के लिए तुर्की के ज़रिए देश के बाहर ले जाया गया है.बीते साल मई में संयुक्त राष्ट्र के द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट में कहा गया था कि उत्तर सीरिया के कई लड़ाकों को लीबिया के गृहयुद्ध में लड़ने के लिए तुर्की के ज़रिए वहां ले जाया गया था.त्रिपोली में सारियाई लड़ाकों के कई वीडियो सामने आए थे जिसके बाद तुर्की पर आरोप लगा था कि वो वहां के गृहयुद्ध में घी डालने का काम कर रहा है.सीरियस ऑब्ज़रवेटरी फ़ॉर ह्यूमन राइट्स के निदेशक रामी अब्दुल रहमान कहते हैं कि लड़ाकों को अज़रबैजान भेजा जाए या नहीं इसे लेकर विपक्षी सारियाई गुट में फिलहाल आम सहमति नहीं है.तुर्कमेन मूल से जुड़े गुटों का कहना है कि तुर्की के कहने पर सैनिकों को वहाँ भेजा जाना चाहिए लेकिन होम्स और गूटा से जुड़े लड़ाकों का कहना है कि ये अज़रबैजान के शिया मुसलमानों और आर्मीनिया के ईसाइयों के बीच की लड़ाई है जिसमें वो शामिल नहीं होना चाहते (विपक्षी सीरियाई सेना में अधिकतर सुन्नी लड़ाके हैं.


देश में कोरोना संक्रमण के मामलों में लगातार बढ़ोतरी से संक्रमितों का आंकड़ा 65 लाख को पार कर 65.37 लाख से अधिक हो गई। हालांकि राहत की बात यह है कि नए मामलों की तुलना में स्वस्थ लोगों की संख्या अधिक होने के कारण सक्रिय मामले घटकर 9.40 लाख के करीब पहुंच गए हैं।विभिन्न राज्यों से प्राप्त रिपोर्ट के मुताबिक आज देर रात तक 66,219 नए मामले सामने आने से संक्रमितों की संख्या 65,37,708 हो गई है और इस दौरान 786 और मरीजों की मौत होने से मृतकों की संख्या 1 लाख को पार कर 1,01,661 पर पहुंच गई है। राहत की बात यह है कि देश में नए मामलों की तुलना में कोरोनावायरस से निजात पाने वालों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। इस दौरान 71,023 और लोगों के स्वस्थ होने से रोग मुक्त लोगों की संख्या 54,96,100 हो ग


अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के डॉक्टरों के एक पैनल ने सुशांत सिंह राजपूत केस में मर्डर की थ्योरी को खारिज कर द‍िया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन हालातों में मौत हुई है वो आत्महत्या का मामला है। अब AIIMS की रिपोर्ट मिलने के बाद सीबीआई इस मामले की जांच आत्‍महत्‍या के एंगल से करेगी। आगे की तफ्तीश में यह तलाशने की कोशिश की जाएगी कि अगर सुशांत ने आत्महत्या की थी तो उसकी वजह क्या थी? क्या किसी ने उसे आत्महत्या के लिए उकसाया था?


बिहार चुनाव: बीजेपी चुनाव समिति की बैठक आज, NDA में कुछ यूं हो सकता है सीटों का बंटवारा...बिहार चुनाव को लेकर बीजेपी की चुनाव समिति की बैठक आज होनी है. माना जा रहा है कि सीएम नीतीश कुमार की जेडीयू के खाते में 122 सीटें आएंगी, जिसमें जीतन राम मांझी की हम पार्टी को भी उन्हीं सीटों में शामिल किया जाएगा. जबकि बीजेपी के खाते में 121 सीटें आ सकती हैं. अगर चिराग पासवान एनडीए में रहते हैं तो बीजेपी उन्हें अपने खाते की सीटों से सीट दे सकती है. हालांकि अभी चिराग पासवान का आखिरी फैसला होना बाकी है. लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने अपनी पार्टी के ‘बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट’ दृष्टि पत्र के लिए लोगों का आशीर्वाद मांगा है. यह दस्तावेज इस बारे में संकेत देता है कि पार्टी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के तहत राज्य विधानसभा चुनाव नहीं लड़ सकती है.भाजपा ने बिहार में विधान परिषदों के चुनावों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की है. ये चुनाव हर दो साल पर होते हैं. महागठबंधन में सीटों के बंटवारे के ऐलान के साथ ही दरार पड़ गई है. विकासशील इंसान पार्टी के अध्यक्ष मुकेश सहनी ने अपने दल की सीटों की संख्या घोषित नहीं किए जाने को लेकर महागठबंधन छोड़ने की घोषणा की है. बिहार चुनाव को लेकर विपक्षी महागठबंधन में सीट बंटवारे का ऐलान हो गया है. तेजस्वी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे.


हाथरस में दलित लड़की के परिवार से मिले प्रियंका और राहुल गांधी। चौतरफा दबाव के बीच यूपी सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश की। हाथरस गैंगरेप केस में सीबीआई जांच की सिफारिश के बाद भी राजनीतिक दलों में बेचैनी है। यूपी सरकार। प्रियंका ने कहा, इंसाफ होने तक चलेगी लड़ाई। प्रशासन ने परिवार को बेटी का चेहरा तक नहीं देखने दिया। इससे पहले नोएडा के पास कांग्रेस कार्यकर्ताओं को लाठीचार्ज से बचाने में पुलिसवालों से भिड़ीं प्रियंका। इससे पहले हाथरस में दलित लड़की के घरवालों ने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में की थी जांच की मांग। पीड़िता के भाई ने कहा, मांगने पर भी अधिकारियों ने नहीं दी पोस्टमार्टम रिपोर्ट। उधर, पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने कहा, यूपी में हो रहा दलितों का उत्पीड़न। बीएसपी चीफ मायावती ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से किया दखल देने का अनुरोध। हाथरस में दलित लड़की के परिवार से मिले प्रियंका और राहुल गांधी। राहुल ने कहा, परिवार को सुरक्षा देने में नाकाम रही 'जो आईएएस और आईपीएस होते हैं, वो बहुत ही जिम्मेदार अफ़सर होते हैं और उनके ऊपर पूरी गवर्नमेंट का भरोसा होता है। वो ज़िले की सरकार होते हैं, लेकिन अगर उनके स्तर पर ये लापरवाहियां हुईं तो सबसे बड़ी जिम्मेदारी तो उनकी थी और ये सच है कि सरकार ने फैसला लेने में कुछ देरी की।'


पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा, देश की रक्षा सर्वोपरि, लेकिन ऐसा भी समय था, जब देश की रक्षा के मामले में कोताही बरती गई। मनाली से लाहौल-स्पीति घाटी को जोड़ने वाली अटल सुरंग का किया उद्घाटन।


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