तालिबानी जैसी विचारधारा से एक देश ही नहीं समूची मानवता के सपने नष्ट हो जाते हैं

 

 चीन, पाकिस्तान और रशिया का साथ होना और अमेरिका का साथ छोड़ देना चारों की मंशा पर सवाल उठाए जा सकते हैं। इस दुनिया में हर समस्या का समाधान है, परंतु यदि कोई समाधान चाहता ही नहीं है तो फिर कोई कुछ नहीं कर सकता। कोई तालिबान को आतंकवादी मानता है तो कोई विद्रोही। हालांकि असल में वह एक आतंकवादी संगठन ही है यह तय तब होता है जब कोई देश या लोग उसके जुल्म के शिकार होते हैं। कोई संगठन किसी महिला और बच्चों को मार दे तो उसे कैसे आप एक विद्रोही संगठन मान सकते हैं?

शस्त्र से दबाई गई विचारधारा बहुत जल्द ही जीवित होकर पुन: वर्चस्व में जाती है, जबकि तर्क द्वारा दबाई गई विचारधारा लंबे काल तक वर्चस्व में नहीं आती। परंतु लंबे काल बाद वह पुन: वर्चस्व में जाती है क्योंकि जिस तर्क से उसे दबाया गया उसी तर्क से उसे स्थापित भी किया जा सकता है।  तालिबान एक विचारधारा है। सभी तालिबान के खिलाफ लड़ते हैं परंतु विचारधारा के खिलाफ लड़ने के लिए तो अफगानिस्तान के बुद्धिजीवियों के पास कोई योजना है और विश्व के नेताओं के पास। विश्व के नेताओं को इसकी कोई चिंता नहीं है कि कोई देश किस तरह एक जहालत भरी जिंदगी में जी रहा है और अफगानिस्तान के बुद्धिजीवियों को भी इसकी चिंता नहीं सताती है कि देश को किस तरह से जहालत की जिंदगी से बाहार निकालें। अफगानिस्तान जाहिलपन का सबसे अच्छा उदाहरण है। किसी भी देश के भविष्य का आधार स्कूल में पढ़ाई जाने वाली 'शिक्षा पद्धति' होती है। शिक्षा ही उसे या देश को आगे ले जाती है और यही पीछे भी धकेलती है। जिन स्कूलों में सिर्फ धार्मिक पाठ ही प्रमुखता से पढ़ाया जाता है वहां के बच्चे कॉलेज तक आते-आते कट्टर नहीं बनेंगे तो क्या बनेंगे? किसी भी देश को यह देखना चाहिए कि हम कितने साइंटिस्ट पैदा कर रहे हैं, कितने खिलाड़ी पैदा कर रहे हैं और कितने अच्छे नोबेले साहित्यकारों को जन्म दे रहे हैं। यह तीन ऐसी बाते हैं जो व्यक्ति की सोच और देश को बदलने की क्षमता रखती है।  सऊदी अरब और ईरान ने अपनी अपनी विचारधारा को फैलाने और उसे मजबूत करने के लिए दुनियाभर में मदरसों को बढ़ावा दिया है। उन्होंने इसके लिए अच्छी खासी फंडिंग की है। आज हम विश्व में आतंकवाद का जो रूप देख रहे हैं वह सभी प्राथमिक शिक्षा का परिणाम है। तालिबान को सबसे ज्यादा सहयोग सऊदी अरब और पाकिस्तान से मिलता है। सबसे जरूरी है इच्छाशक्ति जो विश्व के बड़े नेताओं के पास है भी तो वे उसे अपने राजनीतिक हित के अनुसार बदलते रहते हैं। जैसे चीन चाहता है कि आतंकवाद हमारे यहां नहीं हो लेकिन वह यह भी चाहता है कि आतंकवाद भारत में पनपता रहे या इसी आतंकवाद के माध्यम से भारत को दबाया जा सकता है। रशिया भी कुछ इसी तरह की सोच रखता है। ऐसे में आतंकवाद का भविष्य हमेशा से ही उज्जवल रहा है। कई लोग ऐसे भी हैं जो तालिबान में इसीलिए शामिल है क्योंकि ऐसा करके वे खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रख सकते हैं। उन्हें यदि सुरक्षा की गारंटी मिले तो वे कभी तालिबान को ज्वाइन नहीं करेंगे। लेकिन होता यह है कि अफगान नागरिकों को सुरक्षा देने वाला कोई और नहीं बाहर का देश होता और सबसे बड़ा संकट यह है कि तालिबान को सुरक्षा देने वाले साऊदी अरब, चीन और पाकिस्तान जैसे देश हैं। ऐसे में अफगान नागरिक यह भी चाहते हैं कि हमारी सुरक्षा हमारे ही नागरिकों के द्वारा हो और साथ ही पाकिस्तान का दखल बंद हो।  अब सवाल यह उठता है कि किस तरह तालिबानी विचारधारा से लड़ा जाए? दरअसल, तालिबान के खिलाफ अफगानिस्तान के अधिकतर लोग हैं और बहुत से ऐसे लोग भी है जो पुराने वामपंथी हैं या रैशनलिज्म को मानने वाले लोग हैं। हालांकि विचारधारा के खिलाफ लड़ने की बात तो सभी करते हैं परंतु लड़ता हुआ कोई नहीं दिखाई देता। जो भी इस विचारधारा के खिलाफ जाता है तालिबान उसे मार देता है। हालांकि विचारधारा की लड़ाई के लिए आजकल कई सोशल प्लेटफॉर्म है। तालिबान जानना है कि हमें लोगों को इतना शिक्षित नहीं होने देना है कि वे सचाई को जाकर हमारे खिलाफ होने लगे। इसीलिए वह सभी तरह के संचार माध्यमों को अपने तरीके से संचालित करना चाहता है और घरों से रेडियो और टीवी जैसे उपकरण को हटाना चाहता है। हालांकि अब इंटनेट और सोशल मीडिया तालिबान के लिए सबसे बड़ा खतरा भी है।  दुनिया ने अफगानी लोगों को एकजुट करके कभी कोई ऐसा प्लेटफॉर्म नहीं दिया और ही सुरक्षा दी जो इस तरह की विचाराधारा से लड़ सके और खुद तालिबान की सोच को ही बदलने का प्रयास कर सके। अमेरिका जब तक अफगानिस्तान में रहा उसने यह प्रयास नहीं किया कि किस तरह तालिबानी सोच को बदला जाए। उसने यह प्रयास भी नहीं किया कि किस तरह अफगान को आधुनिक सोच का मुल्क बनाया जाए। सोच बदलेगी तो मुल्क बदलेगा। लोगों को कट्टरपंथी सोच से मुक्त करने के लिए सबसे जरूरी है कि हम बच्चों को साइंस की शिक्षा दें और उसके साथ अर्थ को भी जोड़े। जिस तरह सऊदी अरब ने आधुनिक विचारधारा के खिलाफ फंडिंग की, क्या दूसरे देश कट्टरपंथी विचारधारा के खिलाफ लड़ने के लिए फंडिंग नहीं कर सकते? एक दौर था जबकि सोवियत संघ ने सभी वामपंथियों को एकजुट करके एक नया अफगानिस्तान बनाया था। फिर अमेरिका, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने कट्टरपंथी मुजाहिद्दिनों को बढ़ावा देकर सबकुछ बर्बाद कर दिया। दूसरे दौर में जब मुजाहिद्दिनों से तालिबान ने सत्ता हथिया ली तो अमेरिका ने बाद में तालिबान को मात्र 15 दिन में इसीलिए खत्म कर दिया क्योंकि उसने ओसामा बिन लादेन को शरण दे रखी थी। जब तालिबान को खत्म किया था तो अमेरिका ने उन लोगों को सत्ता हाथ में नहीं दी जो इसे अच्छे से चला सकते सकते थे, जैसे नॉर्दन अलायंस। नॉर्दन अलायंस कई सालों से तालिबान से लड़ रहा है लेकिन उसे ना तो रशिया ने मदद की और अमेरिका ने। तब कैसे मुक्त होना अफगानिस्तान तालिबानी सोच से? हमने लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की अहमियत को भी समझा। धार्मिक कट्टरता जीवन विरोधी है और लोकतंत्र जीवन समर्थक विचारधारा है। धर्म से बढ़कर विज्ञान है, जरा विज्ञान एक बार समझकर तो देखो। आज दुनिया को इससे सबक लेने की जरूरत है कि तालिबानी जैसी विचारधारा से एक देश ही नहीं समूची मानवता के सपने नष्ट हो जाते हैं। एक बात और पढ़े-लिखे तो तालिबानी भी है और अब तो वे अंग्रेजी भी बोलना सीख गए हैं, परंतु उन्होंने किस सब्जेक्ट में ग्रेजुएशन या पोस्ट ग्रेजुएशन किया है यह भी जानना जरूरी है। दूसरी बात यह कि अंग्रेजी सीखने से किसी की सोच नहीं बदल जाती लेकिन हां, साहित्य और विज्ञान पढ़ने से जरूर सोच बदल जाती है और तालिबान यह नहीं चाहता है कि अफगानी लोग साहित्य और विज्ञान पढ़ें।

तालिबान के जंगल राज का सबसे बड़ा नुकसान अफगानिस्तान की महिलाओं को होगा। जिन महिलाओं ने इससे पहले तालिबान शासन को झेला है, वो जानती हैं कि महिलाओं के कोई अधिकार नहीं होते । तालिबानी लड़ाकों ने एक महिला को सरेआम गोली मार दी। काबुल में कई ब्यूटी सैलून से महिलाओं की तस्वीरें हटाई गईं। दीवार तक पर नहीं बर्दाश्त होगी महिलाओं की तस्वीर. अफगानिस्तान में अपने ख़िलाफ़ प्रदर्शन पर हिंसक हुआ तालिबान। जलालाबाद में विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों पर फायरिंग। ख़बरों के मुताबिक, तीन लोग मारे गए. अफगानिस्तान में तालिबान का क्रूर चेहरा सामने आने लगा है। 4 अफगान कमांडरों को कथित तौर पर कंधार स्टेडियम में फांसी पर लटका दिया गया। 20 साल में अफगानी समाज में भी काफी बदलाव आया है। वो उसी तरह का समाज नहीं है, जैसा कि 1996 से 2001 तक का था। विचार तो कुछ भी नहीं बदले होंगे। तालिबान के विचार बदलने की तो उम्मीद कम है। अफगानिस्तान लोग मानो मौत का इंतजार कर रहे. वहां पर अफरा-तफरी का माहौल है। वहां बैंक खाली हो चुुके हैं, सेंट्रल बैंक के गवर्नर का पता नहीं है और पूरी अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ वहां की जनता ने विद्रोह का बिगुल फूंक दिया है.

गीतकार जावेद अख्तर ने अफगानिस्तान की हालत देखकर अमेरिका पर अमेरिका अपना गुस्सा व्यक्त किया है। उन्होंने लिखा, ये अमेरिका कैसी महाशक्ति है जो तालिबान के बर्बर लोगों को खत्म नहीं कर सका। और महिलाओं को कट्टरपंथियों के आगे छोड़ दिया, सभी पश्चिमी देशों पर शर्म आती है जो खुद को मानवाधिकार का रक्षक समझते हैं। अनुष्का शर्मा ने विमान से जमीन पर गिरते लोगों की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, ये दिल चीर कर रखने वाला है किसी को भी ऐसे हालातों का सामना करना पड़े। स्वरा भास्कर ने लिखा, अफगान के लोगों को भेड़ियों के हवाले कर दिया गया है। तालिबान अपने बल और शक्ति से महिलाओं पर क्रूरता करता है वो हत्यारे हैं और महिलाओं से नफरत करते हैं। मोहम्मद जीशान अयूब ने लिखा, अफगानिस्तान के लोगों के लिए दुआएं... अल्लाह आपका साथ दे और आपको इन फासीवादियों से लड़ने की शक्ति दे।

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अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी पर राष्ट्रपति जो बाइडन ने बड़ा बयान दिया है। बाइडन ने कहा है कि वहां से सैनिकों की वापसी के बाद अराजकता का माहौल बनना तय था। इस बीच, अमेरिका, भारत और अन्य देश इस बात पर सहमत हुए हैं कि अफगानिस्तान में समावेशी सरकार की जरूरत है और यहां आतंक के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

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अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों सभी तालिबान खातों पर नजर रख रहे थे। ये कंपनियां उन पर कड़ी नजर रखने के साथ तालिबान से संबंधित अकाउंट को बैन कर रही हैं। तालिबान को व्हाट्सएप सहित सभी फेसबुक ऐप से आधिकारिक रूप से बैन कर दिया गया है। फेसबुक ने तालिबान को खतरनाक संगठन घोषित किया है। तालिबान भले ही शांतिपूर्ण शासन की बात कर रहा है, लेकिन अफगानी लोगों में उसके क्रूर शासन का खौफ है। इस बीच सोशल मीडिया प्लेटफार्म फेसबुक ने तालिबान को एक आतंकवादी संगठन बताया है। फेसबुक ने कहा कि अमेरिकी कानून के तहत तालिबान को एक आतंकवादी संगठन के रूप में स्वीकार किया गया है, इसलिए फेसबुक ने अपनी नीतियों के तहत तालिबान को अपनी सेवाओं से प्रतिबंधित कर दिया है। सोशल मीडिया कंपनी फेसबुक ने कहा है कि उसने मंच पर तालिबान और उसका समर्थन करने वाली सभी सामग्री को प्रतिबंधित कर दिया है, क्योंकि वह समूह को आतंकवादी संगठन मानता है। कंपनी का कहना है कि उसके पास बागी समूह से संबंधित सामग्री पर नजर रखने और उसे हटाने के लिए अफगान विशेषज्ञों की एक समर्पित टीम है। इसका मतलब है कि तालिबान द्वारा या तालिबान की तरफ से बने अकाउंटों को हटाया जाएगा और उनकी तारीफ, समर्थन और प्रतिनिधित्व करने वालों को प्रतिबंधित किया जाएगा। सोशल मीडिया कंपनी ने कहा कि यह राष्ट्रीय सरकारों की मान्यता के बारे में निर्णय नहीं लेता बल्कि इसके बजाय 'अंतरराष्ट्रीय समुदाय के प्राधिकार' का अनुसरण करता है।

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