जातिगत जनगणना कराने के पक्ष में अपने-अपने तर्क

 

 नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्टर मैनेजमेंट (एनडीएमआई) ने कहा है कि देश में कोरोना की तीसरी लहर अक्टूबर महीने में आ सकती है। इसे देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज अधिकारियों की समीक्षा बैठक बुलाई है।

बिहार की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में ऐसी तस्वीर देखने को नहीं मिली, जहाँ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव दोनों किसी एक मुद्दे पर एकमत हो. ये मुद्दा है जातिगत जनगणना का है. दोनों नेता आपसी मतभेद को भुलाकर केंद्र सरकार से जातिगत जनगणना कराने के लिए गुहार लगाते नज़र आए. दोनों ने जातिगत जनगणना कराने के पक्ष में अपने-अपने तर्क भी दिए. केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने पिछले ही महीने 20 जुलाई 2021 को लोकसभा में दिए जवाब में कहा कि फ़िलहाल केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति और जनजाति के अलावा किसी और जाति की गिनती का कोई आदेश नहीं दिया है. पिछली बार की तरह ही इस बार भी एससी और एसटी को ही जनगणना में शामिल किया गया है. लेकिन जो मोदी सरकार मंत्रिमंडल विस्तार के बाद ख़ुद को ओबीसी मंत्रियों की सरकार कहते नहीं थक रही थी, जो सरकार नीट परीक्षा के ऑल इंडिया कोटे में ओबीसी आरक्षण देने पर ख़ुद अपनी पीठ थपथपाती रही है, आख़िर वही मोदी सरकार जातिगत जनगणना से क्यों डर रही है? ये सवाल विपक्ष लगातार सत्ता पक्ष से पूछ रहा है. उनका साथ एनडीए के कुछ सहयोगी दल भी दे रहे हैं. साल 1990 में केंद्र की तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग, जिसे आमतौर पर मंडल आयोग के रूप में जाना जाता है, की एक सिफ़ारिश को लागू किया था. ये सिफारिश अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों में सभी स्तर पर 27 प्रतिशत आरक्षण देने की थी. इस फ़ैसले ने भारत, खासकर उत्तर भारत की राजनीति को बदल कर रख दिया. जानकारों का मानना है कि भारत में ओबीसी आबादी कितनी प्रतिशत है, इसका कोई ठोस प्रमाण फ़िलहाल नहीं है. मंडल कमीशन के आँकड़ों के आधार पर कहा जाता है कि भारत में ओबीसी आबादी 52 प्रतिशत है. हालाँकि मंडल कमीशन ने साल 1931 की जनगणना को ही आधार माना था. इसके अलावा अलग-अलग राजनीतिक पार्टियाँ अपने चुनावी सर्वे और अनुमान के आधार पर इस आँकड़े को कभी थोड़ा कम कभी थोड़ा ज़्यादा करके आँकती आई है. लेकिन केंद्र सरकार जाति के आधार पर कई नीतियाँ तैयार करती है. ताज़ा उदाहरण नीट परीक्षा का ही है, जिसके ऑल इंडिया कोटे में ओबीसी के लिए आरक्षण लागू करने की बात मोदी सरकार ने कही है. सेंटर फ़ॉर स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के प्रोफ़ेसर और राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार का मानना है, "जनगणना में आदिवासी और दलितों के बारे में पूछा जाता है, बस ग़ैर दलित और ग़ैर आदिवासियों की जाति नहीं पूछी जाती है. इस वजह से आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन के हिसाब से जिन लोगों के लिए सरकार नीतियाँ बनाती है, उससे पहले सरकार को ये पता होना चाहिए कि आख़िर उनकी जनसंख्या कितनी है. जातिगत जनगणना के अभाव में ये पता लगाना मुश्किल है कि सरकार की नीति और योजनाओं का लाभ सही जाति तक ठीक से पहुँच भी रहा है या नहीं." वो आगे कहते हैं, "अनुसूचित जाति, भारत की जनसंख्या में 15 प्रतिशत है और अनुसूचित जनजाति 7.5 फ़ीसदी हैं. इसी आधार पर उनको सरकारी नौकरियों, स्कूल, कॉलेज़ में आरक्षण इसी अनुपात में मिलता है." "लेकिन जनसंख्या में ओबीसी की हिस्सेदारी कितनी है, इसका कोई ठोस आकलन नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के मुताबिक़ कुल मिला कर 50 फ़ीसदी से ज़्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता, इस वजह से 50 फ़ीसदी में से अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण को निकाल कर बाक़ी का आरक्षण ओबीसी के खाते में डाल दिया. लेकिन इसके अलावा ओबीसी आरक्षण का कोई आधार नहीं है." यही वजह है कि कुछ विपक्षी पार्टियाँ जातिगत जनगणना के पक्ष में खुल कर बोल रही है. कोरोना महामारी की वजह से जनगणना का काम भी ठीक से शुरू नहीं हो पाया है. आज भले ही बीजेपी संसद में इस तरह के जातिगत जनगणना पर अपनी राय कुछ और रख रही हो, लेकिन 10 साल पहले जब बीजेपी विपक्ष में थी, तब उसके नेता ख़ुद इसकी माँग करते थे. बीजेपी के नेता, गोपीनाथ मुंडे ने संसद में 2011 की जनगणना से ठीक पहले 2010 में संसद में कहा था, "अगर इस बार भी जनगणना में हम ओबीसी की जनगणना नहीं करेंगे, तो ओबीसी को सामाजिक न्याय देने के लिए और 10 साल लग जाएँगे. हम उन पर अन्याय करेंगे." इतना ही नहीं, पिछली सरकार में जब राजनाथ सिंह गृह मंत्री थे, उस वक़्त 2021 की जनगणना की तैयारियों का जायजा लेते समय 2018 में एक प्रेस विज्ञप्ति में सरकार ने माना था कि ओबीसी पर डेटा नई जनगणना में एकत्रित की जाएगी. दूसरी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस की बात करें, तो 2011 में SECC यानी सोशियो इकोनॉमिक कास्ट सेंसस आधारित डेटा जुटाया था. चार हजार करोड़ से ज़्यादा रुपए ख़र्च किए गए और ग्रामीण विकास मंत्रालय और शहरी विकास मंत्रालय को इसकी ज़िम्मेदारी सौंपी गई. साल 2016 में जाति को छोड़ कर SECC के सभी आँकड़े प्रकाशित हुए. लेकिन जातिगत आँकड़े प्रकाशित नहीं हुए. जाति का डेटा सामाजिक कल्याण मंत्रालय को सौंप दिया गया, जिसके बाद एक एक्सपर्ट ग्रुप बना, लेकिन उसके बाद आँकड़ों का क्या हुआ, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है. माना जाता है कि SECC 2011 में जाति आधारित डेटा जुटाने का फ़ैसला तब की यूपीए सरकार ने राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू यादव और समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव के दवाब में ही लिया था. देश की ज़्यादातर क्षेत्रीय पार्टियाँ जातिगत जनगणना के समर्थन में है, ऐसा इसलिए क्योंकि उनका जनाधार ही ओबीसी पर आधारित है. इसका समर्थन करने से सामाजिक न्याय का उनका जो प्लेटफ़ॉर्म है, उस पर पार्टियों को मज़बूती दिखती है. लेकिन राष्ट्रीय पार्टियाँ सत्ता में रहने पर कुछ और विपक्ष में रहने पर कुछ और ही कहती हैं. विपक्ष में आने के बाद कांग्रेस ने भी 2018 में जाति आधारित डेटा प्रकाशित करने के लिए आवाज़ उठाई थी. लेकिन उन्हें सफ़लता नहीं मिली. अब तक की जानकारी में जो आँकड़े हैं, वो ऊपर नीचे होने की पूरी संभावना है. मान लीजिए ओबीसी की आबादी 52 प्रतिशत से घट कर 40 फ़ीसदी रह जाती है, तो हो सकता है कि राजनीतिक पार्टियों के ओबीसी नेता एकजुट हो कर कहें कि ये आँकड़े सही नहीं है. और मान लीजिए इनका प्रतिशत बढ़ कर 60 हो गया, तो कहा जा सकता है कि और आरक्षण चाहिए. सरकारें शायद इस बात से डरती है.

 

चूँकि आदिवासियों और दलितों के आकलन में फ़ेरबदल होगा नहीं, क्योंकि वो हर जनगणना में गिने जाते ही हैं, ऐसे में जातिगत जनगणना में प्रतिशत में बढ़ने घटने की गुंज़ाइश अपर कास्ट और ओबीसी के लिए ही है. मोदी सरकार ओबीसी पर मुखर हुई है, केंद्र सरकार आने वाले दिनों में जातिगत जनगणना पर पहल कर भी सकती है. "जनगणना अपने आप में बहुत ही जटिल कार्य है. जनगणना में कोई भी चीज़ जब दर्ज हो जाती है, तो उससे एक राजनीति भी जन्म लेती है, विकास के नए आयाम भी उससे निर्धारित होते हैं. इस वजह से कोई भी सरकार उस पर बहुत सोच समझ कर ही काम करती है. एक तरह से देखें तो जनगणना से ही जातिगत राजनीति की शुरुआत होती है. उसके बाद ही लोग जाति से ख़ुद को जोड़ कर देखने लगे, जाति के आधार पर पार्टियाँ और एसोसिएशन बनने लगे."

अभी जो राजनीति होती है, उसका ठोस आधार नहीं है, उसे चुनौती दी जा सकती है, लेकिन एक बार जनगणना में वो दर्ज हो जाएगा, तो सब कुछ ठोस रूप ले लेगा. कहा जाता है, 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी'. अगर संख्या एक बार पता चल जाए और उस हिसाब से हिस्सेदारी दी जाने लगे, तो कम संख्या वालों का क्या होगा? उनके बारे में कौन सोचेगा? इस तरह के कई सवाल भी खड़े होंगे. ओबीसी और दलितों में ही बहुत सारी छोटी जातियाँ हैं, उनका कौन ध्यान रखेगा? बड़ी संख्या वाली जातियाँ आकर माँगेंगी कि 27 प्रतिशत के अंदर हमें 5 फ़ीसदी आरक्षण दे दो, तो बाक़ियों का क्या होगा? ये जातिगत जनगणना का एक नकारात्मक पहलू है. लेकिन एक सकारात्मक पहलू ये भी है कि इससे लोगों के लिए नीतियाँ और योजनाएँ तैयार करने में मदद मिलती है." एक दूसरा डर भी है. ओबीसी की लिस्ट केंद्र की अलग है और कुछ राज्यों में अलग लिस्ट है. कुछ जातियाँ ऐसी हैं जिनकी राज्यों में गिनती ओबीसी में होती है, लेकिन केंद्र की लिस्ट में उनकी गिनती ओबीसी में नहीं होती. बिहार में बनिया ओबीसी हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में वो अपर कास्ट में आते हैं. वैसे ही जाटों का हाल है. हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों पर भी ओबीसी लिस्ट अलग है. ऐसे में जातिगत जनगणना हुई तो आगे और बवाल बढ़ सकता है. केंद्र की सरकारों को एक डर इसका भी है.

अफगानिस्तान में पंजशीर पर कब्जे के लिए गए तालिबान को लगा झटका। सूत्रों के मुताबिक- विद्रोहियों ने तालिबानी कमांडर समेत 50 लड़ाकों को मार गिराया, 20 से अधिक को बनाया बंधक। वहीं, पंजशीर समर्थक एक लड़ाके की मौत, 6 अन्य घायल हुए।

तालिबान की धमकी- 31 अगस्त तक अफगानिस्तान से अपनी सेना हटाए नाटो। जवाब में फ्रांस ने कहा- डेडलाइन खत्म होने के बाद भी जारी रखेंगे रेस्क्यू। इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने जंग में मदद करने वाले अफगानियों को शरण देने का किया ऐलान।

एयरपोर्ट और हाईवे जैसी प्रॉपर्टीज के इस्तेमाल का अधिकार बेचकर 4 साल में 6 लाख करोड़ रुपये जुटाएगी केंद्र सरकार। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जारी किया रोडमैप। एसेट मोनेटाइजेशन का पैसा इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने में खर्च करेगी सरकार।

महाराष्ट्र में दही हांडी उत्सव को लेकर तकरार। सीएम उद्धव ठाकरे ने बोले- कोरोना की तीसरी लहर की आशंका को देखते हुए इस साल नहीं होगा उत्सव का आयोजन। वहीं, बीजेपी ने सरकार के फैसले का किया विरोध। कहा- हर हाल में करेंगे उत्सव का आयोजन।

लैप्स पॉलिसीज के रिवाइवल के लिए विशेष अभियान चला रही है LIC इसमें 1 लाख रुपये तक के प्रीमियम पर लेट फीस में 20 फीसदी मिलेगी छूट। 22 अक्टूबर तक जारी रहेगा अभियान।

विदेश में पढ़ने के लिए ग्लोबल-एड वैंटेज स्कीम के तहत डेढ़ करोड़ रुपये तक लोन दे रहा एसबीआई। कोर्स पूरा होने के छह महीने बाद शुरू होगा लोन का भुगतान। 8.65 फीसदी रहेगी ब्याज दर।

हरे निशान में खुले एशियाई बाजार। यूरोपीय मार्केट्स में भी तेजी का रुख। वहीं, पिछले कारोबारी सत्र में बढ़त के साथ बंद हुए थे सेंसेक्स और निफ्टी।

अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा हो जाने के बाद वहां से भागकर दिल्ली पहुंचे अफगान नागरिक दिल्ली में यूएनएचसीआर दफ्तर के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं। इन नागरिकों की मांग है कि उन्हें शरणार्थी कार्ड और किसी तीसरे देश में उनके पुनर्वास की व्यवस्था की जाए। 'हम ऐसे लोग हैं जिनके पास कोई देश नहीं', दिल्ली में UNHCR दफ्तर के बाहर अफगान नागरिकों की पीड़ा.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने किया नैशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन का उद्घाटन। कहा, सिर्फ कम इस्तेमाल की गई संपत्तियों को ही बेचा जाएगा। सरकार के पास रहेगा मालिकाना हक। अपनी संपत्तियों का बेहतर तरीके से इस्तेमाल करेगी सरकार।

नए कृषि कानूनों के चलते किसानों के धरना प्रदर्शन की वजह से बंद सड़कों पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से किया सवाल। कहा, प्रदर्शन करने का अधिकार पर सड़कों पर नहीं रोकी जा सकती आवाजाही। समाधान ढूंढे सरकार। बंद सड़कों की वजह से लोगों को काफी समय से हो रही है परेशानी।

भारत इंग्लैंड के बीच 25 अगस्त को होने वाले तीसरे टेस्ट मैच से बाहर हुए इंग्लैंड के तेज गेंदबाज मार्क वुड। लॉर्ड्स टेस्ट के चौथे दिन फील्डिंग करते वक्त लगी थी कंधे में चोट। फिलहाल पांच टेस्ट मैच की इस सीरीज में भारत 1-0 से आगे।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख के सहयोगी कुंदन शिंदे और संजीव पलांडे के खिलाफ चार्जशीट दायर किया है।

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गुजरात उच्च न्यायालय ने पूछा है कि क्या कोई महिला अपने बच्चे के पिता का नाम बताने के लिए बाध्य है, जिसको उसने शादी के बिना जन्म दिया हो।

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आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले में पलासा के निकट राष्ट्रीय राजमार्ग-16 पर सोमवार को एक सड़क दुर्घटना में एक उप-निरीक्षक समेत 4 पुलिसकर्मियों की मौत हो गई।

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राजस्थान में एक हैरान कर देने वाली घटना सामने आई है। 2 नाबालिग लड़कों ने 12 वर्षीय एक लड़की से उसके स्कूल में बलात्कार किया है और उसने जोधपुर के अस्पताल में बच्चे को जन्म दिया है।

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